देहरादून। उत्तराखंड में प्रस्तावित जनगणना प्रक्रिया को लेकर विशेष रणनीति तैयार की गई है। राज्य के उच्च हिमालयी और बर्फबारी से प्रभावित क्षेत्रों—जिनमें बदरीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री जैसे प्रमुख धाम शामिल हैं—में जनगणना फरवरी 2027 के बजाय सितंबर 2026 में कराई जाएगी। इसका मुख्य कारण सर्दियों के दौरान होने वाला पलायन और भारी बर्फबारी है, जिससे इन इलाकों में स्थायी आबादी मौजूद नहीं रहती।
जनगणना निदेशक ईवा आशीष श्रीवास्तव के अनुसार, प्रदेश के 131 गांवों और तीन कस्बों को चिन्हित किया गया है, जहां फरवरी माह में लोग निचले क्षेत्रों की ओर चले जाते हैं। ये गांव मुख्य रूप से पिथौरागढ़, चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिलों में स्थित हैं। यदि इन क्षेत्रों में सामान्य समय पर जनगणना कराई जाती, तो बड़ी संख्या में घर खाली मिलते और वास्तविक आबादी का सही आंकड़ा दर्ज नहीं हो पाता।
धार्मिक धामों में भी सितंबर में होगी गणना
बदरीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री जैसे धार्मिक स्थलों पर भी सर्दियों में गतिविधियां लगभग ठप रहती हैं। भारी बर्फबारी के कारण यहां स्थानीय निवासियों की मौजूदगी नहीं होती। ऐसे में इन क्षेत्रों में सितंबर माह में जनगणना कराकर वास्तविक जनसंख्या का सटीक डेटा जुटाने का निर्णय लिया गया है।
34 हजार कर्मचारियों की लगेगी ड्यूटी
पूरे राज्य में जनगणना कार्य के लिए करीब 34 हजार सरकारी कर्मचारियों को तैनात किया जाएगा। इनमें शिक्षक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, राजस्व कर्मी और अन्य विभागों के कर्मचारी शामिल होंगे। सभी को चरणबद्ध तरीके से प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि डिजिटल और पारंपरिक दोनों माध्यमों से डेटा संग्रहण सुचारू रूप से हो सके।
दुर्गम क्षेत्रों के लिए विशेष व्यवस्था
प्रशासन का कहना है कि कई पर्वतीय गांव ऐसे हैं, जहां पहुंचने के लिए लंबी पैदल दूरी तय करनी पड़ती है। इसलिए मौसम, भौगोलिक परिस्थितियों और लॉजिस्टिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सितंबर का समय चुना गया है। राज्य और केंद्र सरकार के बीच समन्वय स्थापित कर जनगणना को तकनीक आधारित और अधिक सटीक बनाने की तैयारी की गई है।
अधिकारियों के मुताबिक, इस बार की जनगणना से प्राप्त आंकड़े विकास योजनाओं के निर्माण, संसाधनों के बेहतर आवंटन और दूरस्थ क्षेत्रों की वास्तविक जरूरतों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।