पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच एक बेहद अहम और उच्च-स्तरीय बैठक होने जा रही है। 1979 के बाद यह पहला मौका है जब दोनों धुर विरोधी देश इस तरह की बातचीत के लिए एक मंच के करीब पहुंचे हैं। हालांकि, इस 'करो या मरो' वाली बैठक का स्वरूप क्या होगा, इसे लेकर अभी भी भारी सस्पेंस बरकरार है। अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में इसे लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं।
वेबसाइट के पाठकों के लिए इस ऐतिहासिक वार्ता से जुड़ी 5 प्रमुख बातें यहाँ दी गई हैं:
1. बातचीत के तरीके पर सस्पेंस: डायरेक्ट या प्रॉक्सी?
इस हाई-प्रोफाइल बैठक के तरीके को लेकर दुनिया भर में असमंजस की स्थिति है:
एएफपी (AFP) का दावा: दोनों देशों के नेता आमने-सामने नहीं बैठेंगे। वे अलग-अलग कमरों में रहेंगे और पाकिस्तानी अधिकारी 'शटल डिप्लोमेसी' (बिचौलिए) के जरिए एक कमरे से दूसरे कमरे तक संदेश और प्रस्ताव लेकर जाएंगे।
डॉन (Dawn) की रिपोर्ट: पाकिस्तान के इस प्रमुख अख़बार के मुताबिक, 1979 के बाद यह पहला मौका होगा जब अमेरिका और ईरान के बीच सीधे (आमने-सामने) इतनी बड़ी बातचीत होगी।
शिन्हुआ (Xinhua) का नज़रिया: चीनी न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, पाकिस्तान दोनों ही स्थितियों (सीधी बातचीत या मध्यस्थता) के लिए पूरी तरह तैयार है।
2. दिग्गजों का जमावड़ा: कौन कर रहा है नेतृत्व?
इस्लामाबाद पहुंच चुकी दोनों टीमों का नेतृत्व शीर्ष स्तर के नेता कर रहे हैं।
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल: इसकी कमान सीधे तौर पर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के हाथों में है।
ईरानी प्रतिनिधिमंडल: इसका नेतृत्व ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बघेर गालिबाफ कर रहे हैं। ईरानी न्यूज़ एजेंसी 'मेहर' के मुताबिक, मुख्य वार्ता की टेबल पर बैठने से पहले दोनों टीमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ से अलग-अलग मुलाकात करेंगी।
3. कितने दिन चलेगी यह अहम बैठक?
बैठक के आधिकारिक तौर पर शुरू होने का समय अभी साफ़ नहीं है, लेकिन इसकी अवधि को लेकर भी विरोधाभासी खबरें हैं:
CNN का मानना है कि यह जटिल बातचीत कई दिनों तक खिंच सकती है।
वहीं, ईरान की न्यूज़ एजेंसी 'तस्नीम' ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि योजना के अनुसार यह बैठक सिर्फ एक ही दिन चलेगी। (तस्नीम के अनुसार, ईरानी टीम दोपहर करीब 1:00 बजे पीएम शरीफ से मिल चुकी है)।
4. पाकिस्तान की भूमिका: 'करो या मरो' की स्थिति
अमेरिका और ईरान को एक साथ लाने में पाकिस्तान ने एक बड़ी कूटनीतिक भूमिका निभाई है।
विशेषज्ञों की टीम: 'AFP' के अनुसार, पाकिस्तान ने नेविगेशन, परमाणु मुद्दों और अन्य तकनीकी विषयों पर चर्चा को आसान बनाने के लिए विशेषज्ञों की एक विशेष टीम गठित की है।
पीएम का बयान: पाकिस्तानी पीएम शहबाज़ शरीफ़ ने इस तनावपूर्ण माहौल को देखते हुए इस वार्ता को बेहद मुश्किल और 'करो या मरो' जैसी स्थिति करार दिया है।
5. वार्ता की असली वजह और ईरान की कड़ी शर्त
यह पूरा कूटनीतिक जमावड़ा 28 फरवरी को ईरान पर हुए अमेरिका-इजरायली हमलों और उसके बाद ईरान द्वारा किए गए जवाबी हमलों से उपजे भयंकर तनाव को शांत करने के लिए किया जा रहा है।
दुनिया की नज़र और शर्तें: इस पूरे घटनाक्रम पर मिस्र और तुर्की जैसे क्षेत्रीय देशों (जिन्होंने मध्यस्थता में मदद की) की भी पैनी नज़र है। किसी भी संभावित समझौते की गारंटी के लिए चीन का नाम भी सामने आ रहा है, हालांकि उसकी भूमिका पर अभी तस्वीर साफ नहीं है। इन सबके बीच, ईरान ने अपना रुख बेहद कड़ा रखा है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक लेबनान में युद्धविराम सहित उसकी अन्य शर्तें नहीं मानी जातीं, तब तक वह इस बातचीत में आगे नहीं बढ़ेगा।
