अमेरिका ने भारत समेत दुनिया की 60 अर्थव्यवस्थाओं को लेकर एक नई जांच शुरू की है। इस जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या इन देशों की सरकारों ने जबरन मजदूरी (Forced Labour) से बने सामानों के आयात को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए हैं या नहीं।
यह जांच यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) के कार्यालय द्वारा 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301(b) के तहत शुरू की गई है। इसी कानून का उपयोग अमेरिका तब करता है, जब उसे लगता है कि किसी विदेशी सरकार की नीतियां अमेरिकी व्यापार पर बोझ डाल रही हैं या उसे सीमित कर रही हैं।
जबरन मजदूरी से बने उत्पादों पर रोक की समीक्षा
अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर ने इस कदम की घोषणा करते हुए कहा कि जांच का मुख्य उद्देश्य यह आकलन करना है कि क्या विभिन्न सरकारों ने ऐसे नियम और उपाय लागू किए हैं, जो जबरन मजदूरी से तैयार उत्पादों को उनके बाजारों में प्रवेश करने से रोक सकें।
ग्रीर ने कहा कि जबरन मजदूरी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमति होने के बावजूद कई सरकारें ऐसे उत्पादों को रोकने के लिए प्रभावी उपाय लागू करने में विफल रही हैं।
एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के कई देश जांच के दायरे में
इस जांच में शामिल अर्थव्यवस्थाएं एशिया, यूरोप, अमेरिका और मध्य पूर्व तक फैली हुई हैं। इनमें भारत के अलावा कई बड़े व्यापारिक साझेदार भी शामिल हैं।
जांच के दायरे में शामिल प्रमुख देशों और क्षेत्रों में चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, मेक्सिको, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देश शामिल हैं।
भारत भी जांच सूची में
भारत का नाम भी इस जांच में शामिल किया गया है। अमेरिका यह मूल्यांकन करेगा कि भारत सहित अन्य देशों ने जबरन मजदूरी से बने सामानों को अपने बाजारों में प्रवेश से रोकने के लिए किस प्रकार की नीतियां और कानून लागू किए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस जांच के परिणाम अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों और वैश्विक सप्लाई चेन पर असर डाल सकते हैं।
वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि जांच में किसी देश की नीतियों को अपर्याप्त पाया जाता है तो अमेरिका भविष्य में व्यापारिक प्रतिबंध या अन्य कदम उठा सकता है। इससे वैश्विक व्यापार संबंधों और आयात-निर्यात के नियमों पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना है।
