उत्तर प्रदेश में बिजली की दरें बढ़ने की संभावना बनती दिख रही है। बिजली कंपनियों द्वारा दाखिल वार्षिक राजस्व आवश्यकता (एआरआर) प्रस्तावों पर उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने सशर्त मंजूरी दे दी है। अब मार्च महीने में एआरआर और उस पर आई आपत्तियों पर सुनवाई की जाएगी, जिसके बाद नई बिजली दरें तय हो सकती हैं।
बिजली कंपनियों ने करीब 20 प्रतिशत तक दरों में बढ़ोतरी की मांग की है। इसके पीछे उन्होंने 12,453 करोड़ रुपये का राजस्व अंतर दिखाया है। आयोग ने निर्देश दिया है कि कंपनियां तीन दिनों के भीतर एआरआर को प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित कराएं, ताकि उपभोक्ता और अन्य हितधारक अपनी आपत्तियां और सुझाव दर्ज करा सकें। इसके लिए उपभोक्ताओं को 21 दिन का समय दिया गया है।
स्मार्ट मीटर पर खर्च भी दरों में जोड़ने की मांग
एआरआर में स्मार्ट प्रीपेड मीटर के संचालन पर 3,837 करोड़ रुपये के खर्च को भी शामिल किया गया है। कंपनियों का कहना है कि यह राशि भी बिजली दरों में समायोजित की जाए। हालांकि, विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने एआरआर के आंकड़ों को मनगढ़ंत बताते हुए इस पर सवाल उठाए हैं।
बिना दरें बढ़ाए 1400 करोड़ की वसूली
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में बीते छह वर्षों से बिजली दरों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। इसके बावजूद पिछले 11 महीनों में उपभोक्ताओं से बिजली बिल के अतिरिक्त करीब 1400 करोड़ रुपये की वसूली की गई है। फरवरी के बिल में 10 प्रतिशत अतिरिक्त वसूली के आदेश से खुद नियामक आयोग भी हैरान है। आयोग ने इस मामले में पावर कॉरपोरेशन से सभी संबंधित दस्तावेज तलब किए हैं। सूत्रों के अनुसार, जवाब मिलने के बाद फरवरी की वसूली के साथ-साथ अब तक की कुल अतिरिक्त वसूली की भी जांच हो सकती है।
12 फरवरी को कर्मचारियों का प्रदेशव्यापी प्रदर्शन
एक ओर जहां बिजली दरों को लेकर प्रक्रिया चल रही है, वहीं दूसरी ओर यूपी में बिजली के निजीकरण के विरोध में कर्मचारी 12 फरवरी को प्रदेशभर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करेंगे। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि निजीकरण का फैसला वापस होने तक आंदोलन जारी रहेगा। उनकी प्रमुख मांगों में पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण के निर्णय को तत्काल वापस लेना शामिल है। इस प्रदर्शन में किसान संगठन और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।
