नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। एजेंसी ने आरोप लगाया है कि 8 जनवरी को कोलकाता में I-PAC से जुड़े परिसरों पर चल रही तलाशी के दौरान मुख्यमंत्री और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने जांच में हस्तक्षेप किया और कानून के तहत जब्त किए गए सबूतों को जबरन अपने कब्जे में ले लिया।
ईडी ने अपनी याचिका में कहा है कि इस मामले में मुख्य सचिव, डीजीपी और कोलकाता पुलिस कमिश्नर भी कथित तौर पर उन परिसरों में पहुंचे, जहां PMLA (Prevention of Money Laundering Act) के तहत तलाशी चल रही थी।
‘कानून को हाथ में लेने का पैटर्न’
ईडी ने अदालत को बताया कि जब भी किसी जांच से मुख्यमंत्री के लिए असहज तथ्य सामने आते हैं, तब राज्य की पुलिस और प्रशासन का इस्तेमाल कर जांच को बाधित किया जाता है। एजेंसी ने इसे “कानून को हाथ में लेने का एक पैटर्न” करार दिया है।
₹2,742 करोड़ के कोयला घोटाले से जुड़ा मामला
ईडी ने कहा कि वह ₹2,742 करोड़ के अवैध कोयला खनन से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस की जांच कर रही थी। जांच के दौरान I-PAC के सह-संस्थापक प्रतीक जैन के पास लगभग ₹20 करोड़ के ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ होने के संकेत मिले थे। इसी सिलसिले में तलाशी अभियान चलाया जा रहा था।
एजेंसी का आरोप है कि मुख्यमंत्री और उनके साथ आए अधिकारियों ने ईडी अधिकारियों को धमकाया और उनके हाथ से इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और अहम फाइलें छीन लीं, जिन्हें कानूनी तौर पर जब्त किया जा चुका था।
CCTV फुटेज जब्त कर सबूत मिटाने का आरोप
ईडी ने बंगाल पुलिस पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। एजेंसी का दावा है कि मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों की कथित भूमिका को रिकॉर्ड करने वाले CCTV कैमरों को FIR के बहाने जब्त कर लिया गया, ताकि सबूतों को नष्ट किया जा सके।
ईडी ने यह भी कहा कि केंद्रीय एजेंसियों के अधिकारियों को डराने के लिए उनके खिलाफ झूठी और कई FIR दर्ज की जाती हैं, जिससे वे भविष्य में जांच करने से हिचकें।
CBI जांच की मांग
ईडी ने सुप्रीम कोर्ट से इस पूरे मामले की CBI जांच कराने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि चूंकि राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारी खुद इस घटना में शामिल बताए जा रहे हैं, इसलिए स्थानीय पुलिस से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती।
ईडी ने यह भी बताया कि इस मामले से जुड़ी सुनवाई के दौरान कोलकाता हाई कोर्ट में नारेबाजी और हंगामे के कारण न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की गई है।
