दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पत्नी के बैंक खाते में मौजूद कुछ बचत या किसी परिजन को एक बार में पैसे भेजना, उसे नियमित आय का स्रोत नहीं बनाता। इसलिए पति पर भरण-पोषण (मेंटेनेंस) देने की कानूनी जिम्मेदारी बनी रहती है।
क्या है मामला?
दंपति की शादी वर्ष 2001 में हुई थी और उनकी एक बेटी भी है। लेकिन वर्ष 2015 से दोनों अलग-अलग रह रहे हैं। इसके बाद पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक की अर्जी दायर की। इसी बीच फैमिली कोर्ट ने मार्च 2021 में अंतरिम भरण-पोषण का आदेश जारी किया, जिसके तहत पति को पत्नी और बेटी—दोनों को 25-25 हजार रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया गया।
पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका तर्क था कि पत्नी ने वर्ष 2018 में अपने भाई के खाते में 82 हजार रुपये ट्रांसफर किए थे और उसके बैंक खाते में कुछ बचत भी है। पति के अनुसार, इससे साबित होता है कि पत्नी के पास पर्याप्त आय है, इसलिए भरण-पोषण की आवश्यकता नहीं है।
कोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने पति की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि किसी एक बार के ट्रांजेक्शन या मामूली बचत को स्थायी आय नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब तक नियमित नौकरी, व्यवसाय या अन्य स्थायी कमाई के ठोस प्रमाण न हों, तब तक ऐसे उदाहरणों के आधार पर भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि—
“कुछ बचत होना या भाई को एक बार पैसे ट्रांसफर करना यह साबित नहीं करता कि पत्नी के पास स्वयं और बच्चे को पति के बराबर जीवनस्तर देने के लिए स्थिर आय है।”
अन्य मांग भी खारिज
पति ने यह मांग भी रखी कि भरण-पोषण की राशि जॉइंट अकाउंट में जमा कराई जाए ताकि वह देख सकें कि पैसा बच्ची के कल्याण पर खर्च हो रहा है या नहीं। हाईकोर्ट ने इसे भी अस्वीकार करते हुए कहा कि अंतरिम भरण-पोषण केवल आर्थिक सहायता से संबंधित मुद्दा है, इसका कस्टडी या मुलाक़ात अधिकारों से कोई संबंध नहीं है।
आख़िरकार कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और पति को हर महीने पत्नी और बेटी को 25-25 हजार रुपये देने का निर्देश जारी रखा।
